Monday, December 18, 2017
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लोक में बची रहे बुंदेलखंड की लोक संस्कृति

लोक में बची रहे बुंदेलखंड की लोक संस्कृति
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बसंत ऋतू के आस पास  बुंदेलखंड इलाके में  बुन्देली  सांस्कृतिक के रंग घरों से निकल कर मंचों पर बिखरने लगते हैं । आधुनिकता की दौड़ में और हम कहीं ना कही अपने सांस्कृतिक मूल्यों ,परम्पराओं और तो और भाषा को ही भूलते जा रहे हैं ।  लोकसंस्कृति  को बचाने और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से अवगत कराने के लिए छतरपुर जिले के एक छोटे से गाँव बसारी में पिछले २० साल से  बुन्देली उत्सव होता  आ रहा है । बगैर किसी राजकीय सहयोग के सिर्फ लोगों के आर्थिक सहयोग से होने वाला यह  आयोजन  भी दरअसल राजनैतिक दुराग्रहों का शिकार है ।२१ वे बुन्देली उत्सव के आयोजन के दौरान १७ फरवरी से २१ फरवरी तक यह  गाँव उल्लास और उमंग से सराबोर रहा । ऐसा भी नहीं है की बुन्देली लोकसंस्कृति  पर आयोजन सिर्फ इसी गाँव में होते हो , ऐसे आयोजन पन्ना , दमोह , टीकमगढ़ जिले में भी होते हैं । 
                                           
ये बुन्देली उत्सव के आयोजन का ही फल है की इस छोटे से गाँव में एक विशाल स्टेडियम बन गया । इस मैदान पर  आयोजन के दौरान जब छोटे छोटे बच्चों को गिल्ली डंडा खेलते हुए लोग देखते हैं तो लोगो को अपने अतीत की बरबस याद आ ही जाती है ।  अब तू ये खेल किसी गाँव की गली में भले देखने को मिल जाए  शहरों से तो गायब हो चुका है । बच्चे मोबाइल  और कम्यूटर के खेल में व्यस्त हैं । बुंदेलखंड की मनमोहक चित्रकारी , महिलाओं की कुश्ती प्रतियोगिता , कबड्डी , बालीबाल , घोड़ो का नाच , रस्सा कसी , बुन्देली व्यंजन प्रतियोगिता बरबस ही लोगों का ध्यान अपनी और खीँचती है । चौपड़ पहले बुंदेलखंड के प्रिय खेंलों में से एक होता था , गाँव गाँव में चौपड़ के फड् जमते थे, हालात बदले अब खेल को जानने और समझने वाले कम लोग ही बचे हैं ।  यहां इस खेल की प्रतियोगिता देखते ही बनती थी । जब लोग पांसे फेंक कर जयकारा लगाते थे । 
मंचीय कार्यक्रमो में गीत संगीत की महफिले सजी , जिनकी भी प्रतियोगिता हुई और कलाकर अपना श्रेष्ठतम प्रदर्शन के लिए लालायित दिखे  ।  बुंदेलखंड के अंचल में अब सीमित और लुप्त होते जा रहे  बधाई नृत्य , कछयाई , दीवारी , अहिरयाई  , कहरवा , बनरे , लमटेरा , सैर , ख्याल ,दादरा , गोटें , कार्तिक गीत , आल्हा ,बिलवारी ,काडरा , रावला ,सोहरे ,ढिमरयाई , राई और फाग की लय और  ताल, एक अलग ही रंग जमाते हैं ।  अपने आप में अनोखी इन प्रस्तुतियों को देखने सुनने और समझने का मौका यहाँ मिलता है । हम जिन बैलो को छोड़ कर मशीनी युग में जी रहे हैं उन बैलो की बैल गाडी दौड़ प्रतियोगिता भी किसानों को बैलो से लगाव और प्रकृति से जुड़े रहने का सन्देश देती है  । इस बार डोंडा (नोका ) दौड़ प्रतियोगिता का भी आयोजन हुआ । बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत को लिपि वद्ध करने के लिए हर वर्ष की तरह बुन्देली वसंत पत्रिका का विमोचन भी हुआ । बुंदेलखंड की विरासत को सहेजने और समृद्ध करने वालों का सम्मान भी हुआ । यहां बुन्देली में बनी १४ फिल्मो का पहली बार प्रदर्शन भी किया गया । 
पूर्व विधायक शंकर प्रताप सिंह बुंदेला ,  २० साल पहले  शुरू किये गए इस  आयोजन के सम्बन्ध में बताते  हैं कि  , इस दौर में हम अपनी , बोली ,भाषा ,संस्कृति को भूलते जा रहे हैं , बुंदेलखंड की यह वाणी और संस्कृति बची रहे इसी लिए  यह शुरुआत की थी । आज   पाश्चात्य संस्कृति इतनी हॉबी होती जा रही है कि लोगों का  खान-पान और रहन-सहन बदल गया हैलोक संस्कृति भूलते जा रहे हैं , बुन्देली बोलने में लोगों को शर्म आने लगी है ।लोग अपने बच्चों को बुंदेलखंडी बोलने पर डांटने लगे हैं , यहां तक की मजदूरी करके लौटे लोग भी बुन्देली छोड़ एक अजीब तरह की हिंदी बोलने लगते हैं । 

             

शंकर प्रताप सिंह बुंदेला  के विचारों से सहमत  छतरपुर के प्रमुख साहित्यकार सुरेंद्र शर्मा शिरीष , प्रो बहादुर सिंह परमार , डॉ. हरी सिंह घोष ,के. एल पटेल सहित अनेको साहित्यकार,समाज सेवी बुंदेलखंड की लोकसंस्कृति को बचाने के इस अभियान में जुटे हैं ।  श्री बुंदेला    भले ही इसे गैर राजनैतिक मानकर कार्य करते हैं , अपने इस आयोजन में सभी राजनैतिक दलों के लोगों को जोड़ने का प्रयास भी करते हैं मुख्य अतिथि भी  बनाते हैं , पर सियासत करने वाले इसमें भी राजनैतिक रंग देने से नहीं चूकते । 

श्री बुंदेला  ने जब यह कार्यक्रम शुरू किया था उस समय प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी । शुरुआत के पांच साल तो सरकार और लोगों के सहयोग से ठीक ठाक चले । यह वह दौर था जब सांस्कृतिक विरासत को बचाने के इस अभियान की एक मजबूत नीव बन चुकी थी । सरकार बदली सियासत का और लोगों का मिजाज भी बदल गया । सरकार ने सहयोग पर विराम लगा दिया , सियासत से हित  साधने वाले अनेकों लोगों ने मुंह मोड़ लिया । यहां तक की इस आयोजन के समांनातर छतरपुर में एक आयोजन भी उन्ही दिनों सरकार ने कराया , एक ही साल हुआ ।

 सांस्कृतिक विरासत को सहजने के इस मंच पर नेताओ का  दोहरा  चरित्र  भी देखने को मिलता है  मंच से नेता जी कार्यक्रम की प्रशंसा में तारीफों के पुल बांधते हैं , पर मंच से उतरते ही सब भूल जाते हैं । हालांकि समाज में बीजेपी यह प्रदर्शित करती है की वह लोक संस्कृति , लोक परम्पराओ की वही एक मात्र संरक्षक है पर उनकी सरकार को इससे सरोकार सिर्फ उन्ही इलाकों में रहता है जहां उनके दल से  जुड़े लोग इस तरह के आयोजन करते हैं ।  

देखा जाए तो लोकसंस्कृति किसी बैशाखी की मुहताज ७० -८० के दशक तक नहीं रही । लोकसंस्कृति और लोक परंपराएं बुंदेलखंड के लोगों की जीवन की एक शैली थी और है । पर  बीते दो तीन दशकों में जिस तेजी से जन रंजन के माध्यमो का विस्तार हुआ उसने देश  की तमाम  लोकसंस्कृतियो  पर आघात पहुंचाया है । हालांकि लोकसंस्कृति के  कोई लिखित मापदंड नहीं होते पर इसमें परम्पराओ की जड़ें इतनी गहरी होती हैं की इसको बदलने में सादिया बीत जाती थी । आधुनिकता की जीवन शैली और पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण लोगों को अपनी परम्पराओं से अलग कर देता है । ऐसी दशा में वे न घर के रहते ना घाट के । जिस बुन्देली भाषा के बोलने में आज के बुन्देलखण्ड के नव् धनाड्य वर्ग को शर्म आती है उसके बारे में  देश के जाने माने साहित्यकार प बनारसी दास चतुर्वेदी ने मधुकर पत्रिका में लिखा था कि बुन्देली भाषा  इतनी मधुर और समृद्ध है कि इसके सामने बृज की भाषा कही नहीं लगती ।  

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