Monday, December 18, 2017
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राजनीति में समग्र शुचिता के पुरोधा पं. दीनदयाल उपाध्याय

राजनीति में समग्र शुचिता के पुरोधा पं. दीनदयाल उपाध्याय
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लेखक - भरतचन्द्र नायक
राजनीति में आदर्श की बात करना सरल है
लेकिन आदर्शों को राजनीतिक जीवन की धुरी बनाकर बढ़ना कठिन ही नहीं आज दुर्लभ है। इसका कारण यह हैकि सामाजिक यथार्थ और भविष्य के समाज की कल्पना के लिये बनाये गये आदर्शों के बीच भारी संघर्ष है। इसे समझाने के लिए साठ के दशक पर गौर करना होगा। देश कांग्रेस युक्त था। लोकसभा उपचुनाव के लिये चार क्षेत्र रिक्त थे। बात 1963 की है जब विपक्ष के चार दिग्गज राजकोट से स्वतंत्र पार्टी के मीनू मसानीउत्तरप्रदेश फरूखाबााद से समाजवादी पार्टी के डाॅ. राममनोहर लोहियाअमरोहा से जेबी कृपालानी और जोनपुर से पं. दीनदयाल उपाध्याय कांग्रेस को चुनौती देने के उद्देश्य से चुनाव के मैदान में कूदे थे। डॉ. लोहिया फूलपुर से 1962 में भी पं. नेहरू को टक्कर दे चुके थे। पं. नेहरू डॉ. लोहिया और जेबी कृपलानी के कट्टर विरोधी थे और उनके प्रवेष पर हरचंद अडंगा लगाने के लिए कटिबद्ध थे। पं. दीनदयाल पं. नेहरू की एकाधिकारवादी प्रवृत्ति के विरूद्ध थे। उनका कहना था कि लोकतंत्र में एक दलएक नेताएक सिद्धांत घातक है। मजे की बात है कि जिस जातिवाद के खिलाफ पं. दीनदयाल उपाध्याय थेउसी जातिवाद के आधार पर डाॅ. लोहिया ने फरूर्खाबाद से चुनाव लड़ना तय किया। पं. दीनदयाल ने इस पर विरोध तो किया लेकिन समर्थन में प्रचार करने से एकता के हित मेंबड़े उद्देष्य की पूर्ति के लिए सहमति जता दी। वोट बैंक की राजनीति कांगे्रस ने अमरोहा से षिरोधार्य की और कृपलानी को पराजित करने के लिए संसदीय कमेटी से अनुषंसित प्रत्याषी को खड़ा करने के बजाय हाफिज मोहम्मद इब्राहिम को उतार दिया। क्योंकि यहां तुष्टिकरण परवान चढ़ाना था। पं. दीनदयाल उपाध्याय मानते थे कि तात्कालिक हार जीत कोई मायने नहीं रखती। इसलिए कृपलानी की जीत भारतीय जन संघ की नैतिक जिम्मेदारी मानते हुए मतदान केन्द्र तक जन संघ के कार्यकर्ता तैनात किये। लेकिन जौनपुर में चुनाव लड़ते हुए पं. दीनदयाल ने जातिवाद के नारे को पास नहीं फटकने दिया और अपने क्षेत्र में चुनावी की भरी सभाओं में कहा जो जातीय आधार पर पं. दीनदयाल के समर्थन में आये है वे सभा से प्रस्थान कर जायेंमुझे जाति के आधार पर समर्थन नहीं चाहिए। पं. दीनदयाल ने पराजय स्वीकार करते हुए कहा कि भारतीय जन संघ जीता हैपं. दीनदयाल की पराजय हुई है। जौनपुर से पं. दीनदयाल जीतते तो उपचुनाव की शुचिता का अहसास नहीं होता। उनकी पराजय भारतीय उपचेतना में बीज की तरह मौजूद हैजो जातिवाद के दलदल में फंसी आज की राजनीति के लिए राजनीतिक शुचिता का सामयिक संदेष है। इसकी आज प्रासंगिकता है,क्योंकि चुनाव ने ही जातीय आधार पर समाज को फिरकों में देखना शुरू कर दिया है। राष्ट्र हित तो दूर हम समाज के पहले जाति परस्ती में उलझ जाते है।

पं. दीनदयाल की गणना राष्ट्रपिता बापूसमाजवाद के प्रवर्तक डॉ. राममनोहर लोहियालोकनायक जयप्रकाष नारायणडॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जीबाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के समकक्ष स्वयं हो जाती है,जिसने आदर्शों को गढ़ा और उन पर चलकर जीवन जिया है। वास्तव में वे राजनैतिक दार्शनिक थेऔर उन्हें इस बात का श्रेय जाता है कि जब राजनीति के प्रर्वतक यूरोप की ओर देख रहे थेउन्हें भारतीय राजनीति को देश की परंपराभारतीयता अध्यात्मक से जोड़ा। भारतीय लोकतंत्र को दिशा दी। राजनीति को शुचिता का दर्शन दिया। भारतीयता की जड़ों से राजनीति को जोड़ने में जुटे। उनका दिया एकात्म मानवदर्शन का भारत को ही नहीं विश्व को एक अनुपम उपहार है। यह उनकी ही दूरदर्शिता थी कि भारतीय राजनीति में भारतीय जन संघ की जड़े गहरी हुई और वह अपनी विशिष्ठता की अनुभूति करने में सफल हुआ। जो भारतीय जनता पार्टी को दूसरे दलों की तुलना में विशिष्ठ बनाती है। जन समर्थन का व्यापक आधार बनाने में उनके आदर्श और आदर्शों का यथार्थ रूप लेना पार्टी को वरदान बना।

 पं. दीनदयाल के लिए राजनैतिक अस्तित्व से अधिक राजनैतिक शुचिता और अस्मिता की चिंता जीवन पर्यन्त रही और उन्होनें सीना ठोंककर उसे सफलीभूत कियाक्योंकि उनके लिए सिद्धांत अमूल्य थे,राजनीति उनके लिए सफलता-विफलता का दर्पण नहीं थी। वाक्या राजस्थान का हैबात 1953 की है जब वहां से मात्र आठ विधायक चुनकर आये थे। चुनाव घोषणा पत्र में जमीदारी उन्मूलन में प्रतिबद्धता व्यक्त की गयी थी। लेकिन जब विधेयक विधानसभा के सदन में आया तो भारतीय जन संघ के 6 विधायकों ने जमीदारी प्रथा के उन्मूलन के विरोध में मत दे दिया। उन्होनें इन 6 विधायकों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया और साबित किया कि पार्टी का विचार श्रेष्ठ है। राजनीति कर्मकांड नहीं है।

 एक अवसर ऐसा भी आया जब दलों के विलीनीकरण की जोर-शोर से पंचायत हुई। हिन्दू महासभा के साथ विलय की चर्चा चली तो उन्होनें पूछा कि बतायें कि डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी जिन कारणों से परित्याग किया थाक्या वे सबब विद्यमान नहीं हैयहां विचार भिन्नता थी कि हिन्दू महासभा ने गैर हिन्दुओं से प्रथकता बतायी थी। उन्होनें विलय नामंजूर कर दियाइससे भारतीय जन संघ और पं. दीनदयाल की समावेशी सोच प्रमाणित हो जाती है। उन्होनें राम राज्य परिषद से मिलाप इसलिए खारिज कर दिया कि वह संचालित होती है महलों सेघरानों से करपात्री जी की कुटिया तो मुखौटा है। इसी तरह उन्होनें स्वतंत्र पार्टी से भी आर्थिक मतभेद बताया। उन्होनें कहा कि जनधारणा को कैसे झुठलाया जा सकता है कि स्वतंत्र पार्टी का संचालन दलाल स्ट्रीट से होता है।

 पं. दीनदयाल के सामने समाज और व्यवस्था में जनहितकारी परिवर्तन लाने का उद्देश्य था। इसलिए उन्होनें वामपंथियों के संपूर्ण राष्ट्रीयकरण का भी खुलकर विरोध किया। उनका मानना था कि भारत की आवश्यकता परिवर्तनेच्छु हैअपरिवर्तनेच्छु नहीं। उन्होनें 1967 दिसंबर में केरल के कालीकट में जन संघ अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए जो बात कही वह भारतीय समाज के लिए बीज मंत्र हैशाश्वत सत्य है। उन्होनें कहा कि सामाजिक आर्थिक समानता का संघर्ष किसी एक दल की बपौती नहीं है। सांस्कृतिक राष्ट्रवादीसमतामूलक समाज की कल्पना को साकार करना परम् उद्देश्य है। भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता में आने के बाद इसे अंत्योदय कहकर धरातल पर उतारने का जो देशव्यापी अभियान छेड़ा हैयह उस महामानव के प्रति श्रद्धांजलि की जायेगी। आजादी के बाद 70 वर्ष बाद यदि हम पाते है कि स्वतंत्रता संग्राम में आजादी के दीवानों ने दुःख-दैन्यनिरक्षरताबेरोजगारी समाप्त करने का जो सपना देखा थावह अधूरा है तो उसका यही कारण है कि सत्ता हस्तांतरित होने के बाद भी राजनैतिक संरचना और सोच जस का तस बना रहा। कुर्सी बदली व्यवस्था और सोच नहीं बदल सके। इसके बारे में पं. दीनदयाल ने पहले ही आगाह कर दिया था। फिर एक कारण यह भी कि पंडित जी को काम करने के लिए मुश्किल से डेढ़ दशक का समय मिला,जिसमें उन्होनें एकात्म मानवदर्शन दियाआदर्श गढ़ेआदर्शो को कसौटी पर कसा और उन्हें जीकर दिखा दया। आज हम कहां हैकितना अनुसरण कर पाये हैऔर कितना बाकी हैयह विचारणीय विषय है। पं. दीनदयाल ने यह भी दुनिया के राजनैतिक पंडितों को बता दिया कि जब राजनीति केरियर बन जायेगी,ख्याति का अवसर खोजेगी और सत्ता तथा शक्ति का संसाधन बन जायेगी। यह उचित नहीं होगाक्योंकि ऐसा सोचने वालों के लिए सत्ता साध्य बन चुकेगी। सेवा का आर्दश भटक चुका होगा। जिस परिवर्तन की चिरआशा किये जिये हैवह हमसे दूर चला जायेगा। पं. दीनदयाल उपाध्याय एक पार्टीकिसी विशेष प्रतिबद्धता के प्रवक्ता के पद से बहुत उंचे किसी उत्तुंग शिखर पर विराजते हैजो राजनीति को सौदद्ेश्य बनाने का पक्षधर है।

यह वर्ष पं. दीनदयाल उपाधयय का जन्मशताब्दी वर्ष है। इसलिए इनके राजनैतिक दर्शन को अनुशीलन किसी एक दल का दायित्व नहीं है। क्योंकि आदर्श किसी ने भी स्थापित किया होउसका अनुसरण करना मानवता का सम्मान होता है। यह भी सत्य है कि आदर्श ग्रहणीय तभी होते हैजब आदर्श के पीछे लाभ हानि का बोध नहीं होता। इसका सबसे बड़ा सबूत क्या होगा कि पं. दीनदयाल उपाध्याय के असामयिक दुःखद निधन के बाद जब उनकी राजनैतिक दैनंदिनी का प्रकाशन हुआकांगे्रस के दिग्गज,राष्ट्रवादी और विद्वतापूर्ण नेता डॉ. संपूर्णानंद ने भूमिका में लिखा कि पं. दीनदयाल उपाध्याय के विचार,कृतित्व में भारतीय लोकतंत्र और शुचितापूर्ण राजनीति का बोध परिलक्षित होता है जो दुनिया के राजनेताओं के लिए विचारणीय और प्रेरक तत्व है। लेकिन पं. दीनदयाल उपाध्याय की पाॅलिटिक्ल डायरी पढ़कर हम भले ही आत्मतृप्त हों लेहमें समकालीन राजनीति में लघुता पीड़ादायक हो सकती है।

 

 

 

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