वित्त मंत्री के बयान का दूसरा उजागर पहलू

डॉ. महेश परिमल
नजरिया बदलें, सोच बदल जाएगी…यह उक्ति व्यक्तित्व विकास के लिए ठीक है, पर इस समय देश में जो कुछ चल रहा है, उसमें यह बिलकुल मुफीद है। नए मोटर व्हीकल एक्ट विरोध करने वाले सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों के आंकड़ों को नहीं देख रहे हैं। एक बार यदि इन आंकड़ों का विश्लेषण कर लें, तो उन्हें यातायात के नियमों का पालन करने में आसानी होगी। दूसरी तरफ यदि ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में वाहनों की बिक्री कम हो रही है, तो इसमें चिंता की क्या बात है? हमारे पर्यावरण के लिए तो यह बहुत ही अच्छी खबर है। इसे पर्यावरण की दृष्टि से सोचें और समझें, तो यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि जो भी होता है, अच्छा ही होता है। अब लोग हर दृष्टि से जागरूक होने लगे हैं। यह तो इसी बात से पता चलता है कि लोग अपनी कार रखने के बजाए ओला-उबर की सेवाएं लेने लगे हैं। आप इसे सच नहीं मानेंगे, पर लोगों ने अभी से ही दशहरे और दीवाली के लिए वाहनों को बुक कराना शुरू कर दिया है। इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि लोग कितने जागरूक हैं?
हम बेवजह कार की घटती बिक्री को लेकर परेशान हो रहे हैं। मंदी की आहट से ही लोग चिल्लाने लगे हैं। यह तो सोचो कि कारों की बिक्री कम होगी, तो सड़कों पर कारों की बेतहाशा वृद्धि पर रोक लगेगी। इससे प्रदूषण कम होगा। यह तो कतई घाटे का सौदा नहीं होगा। पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, तभी हम सब सुरक्षित रह पाएंगे। आए दिनों पार्किंग की समस्या को लेकर सिर-फुटौव्वल के हालात पैदा होते रहते हैं, इससे वह स्थिति अब बार-बार नहीं आएगी। आज हर शहर के कई रास्ते ऐसे हैं, जहां कार ले जाने में लोगों की नानी मरती है। फिर जल्द से जल्द और सुरक्षित ऑफिस पहुंचने की कवायद जारी रहती है। आज कार वाला यही सोचने लगा है कि 12 लाख की होंडा गाड़ी लेने से अच्छा है, 70 हजार की एक्टिवा ही ले ले। ताकि समय पर अपने कार्यालय पहुंच तो जाए।
अब हर शहरों की पहचान बन गई है महंगी से महंगी कार। साइकिल के दर्शन ही दुर्लभ हो गए हैं। पहले जिनके घर पर कार होती, वे एक टू व्हीलर अवश्य रखते, ताकि घर के आसपास के काम करने में आसानी हो। अब तो हालात यह है कि कार सप्ताह में एक बार निकालते हैं, बाकी रोज टू व्हीलर का ही इस्तेमाल करते हैं। मतलब कार का होना अनिवार्य है, यह एक फैशन भी बन गया है। कार की बढ़ती मांग के कारण सेकेंड हेंड गाड़ियों की बिक्री भी खूब बढ़ गई है। बैंकें कार-टू व्हीलर के लिए लोन देने के लिए तैयार बैठीं हैं। अब तो वह सेकेंड हेंड कार के लिए भी लोन देने में आनाकानी नहीं करती। उच्च मध्यम वर्ग में फोर व्हीलर अब सामान्य बात हो गई है। इस वर्ग के पास एक फोर व्हीलर और एक टू व्हीलर होती है। महिलाएं के लिए टू व्हीलर वरदान स्वरूप है। इसी कारण टू व्हीलर की बिक्री में उछाल आया है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जब से यह कहा है कि ओला-उबर के कारण कारों की बिक्री में कमी आई है। इसलिए ऑटो मोबाइल क्षेत्र मंदी के दौर से गुजर रहा है।मेरा मानना है कि खड़ी कार भी साल भर में 25 हजार का खर्च तो करवा ही देती है। अपनी कार है, तो उसके प्रीमियम की चिंता भी लगी ही रहती है। टैक्सियों की सेवाएं लो, तो कम से कम पार्किंग की समस्या से निजात मिल जाती है। इसलिए लोग अब अपनी कार के बजाए टैक्सियों की सेवाएं लेना फायदे का सौदा मानते हैं। वास्तव में इस क्षेत्र को जीएसटी की नजर लग गई है, इसलिए यह मंदी के दौर से गुजर रहा है। जीएसटी को लेकर कई क्षेत्रों में विरोध के स्वर मुखर हो रहे हैं। ऑटो क्षेत्र में तो यह किसी विकराल समस्या से कम नहीं है। कार खरीदने वाले को बिल में लिखकर देना होता है कि कार लक्जरी आइटम है। कार खरीदने का सपना हर कोई अपनी आंखों में पालता है। परंतु 75 प्रतिशत लोग टू व्हीलर खरीदकर ही संतोष कर लेते हैं। वित्त मंत्री शायद यह मानती हैं कि ऑटो मोबाइल क्षेत्र प्रेशर टेकनिक अपना रहा है।
जब बिक्री 40 प्रतिशत घट जाए, तो सरकार को यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि लगातार बढ़ने वाला व्यापार अचानक मंद कैसे बढ़ गया? टू व्हीलर की बिक्री में 22 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। ऑटो मोबाइल के क्षेत्र में मंदी के सिक्के के दूसरे पहलू पर भी गौर करें। यह मंदी क्या पर्यावरण के लिए लाभदायी नहीं है। आज टू व्हीलर आवश्यकता है, तो फोर व्हीलर एक दिखावा। हमारे समाज की रचना ही इस तरह से की गई है कि इंसान जैसे ही उच्च मध्यम वर्ग में प्रवेश करता है, तुरंत कार लेने की सोचने लगता है। इसे सोच को अंजाम देने के लिए बैंकें तैयार बैठी हैं, तो वह कार लेकर ही रहता है। हुंडाई, रेनोल्ट, किया मोटर्स, महेंद्रा एंड महेंद्रा और अमीन मोटर्स की बिक्री में 2 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। अब त्योहारी सीजन नहीं है, श्राद्ध पक्ष चल रहे हैं, इस दौरान इनकी बिक्री में और कमी आएगी। परंतु इसके बाद दशहरा और दीवाली में इनकी बिक्री में उछाल आना स्वाभाविक है। इसके लिए अभी से बुकिंग शुरू भी हो गई है। यदि इस क्षेत्र में वाहनों की बिक्री में सचमुच कमी आई है, तो यह दीवाली की खरीदी के बाद ही इसके आंकड़ों से पता चलेगा।
ऑटो मोबाइल क्षेत्र में घटती बिक्री आर्थिक क्षेत्र के लिए भले ही चिंता का विषय हो, पर पर्यावरण प्रेमियों के लिए अच्छी खबर है। वाहनों की बेतहाशा बिक्री से वातावरण लगातार प्रदूषित हो रहा था। इसका असर हम सभी के स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा था। इस दिशा पर लोगों का ध्यान कम ही जाता है। यह तो मान ही लें कि पर्यावरण की दृष्टि से कितने वाहनों की बिक्री हुई, यह महत्वपूर्ण नहीं है, पर कितने वाहन रोड पर कम दिखाई दिए, यह महत्वपूर्ण है। सड़क पर वाहन जितने कम होंगे, हम उतने ही सुरक्षित होंगे। इसके साथ ही प्रदूषण से मुक्त भी होंगे। क्या इस नजरिए से हम ऑटो मोबाइल में और अधिक मंदी की कामना नहीं कर सकते?