ओडिसी नृत्य की उत्पत्ति महारी एवं गोटीपुआ नृत्य से मिलकर हुई

कोलकाता की नृत्यांगना शताब्दि मल्लिक ने दी महत्वपूर्ण जानकारियां
उज्जैन। स्पीक मैके व भारत सरकार के उपक्रम आईओसीएल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम की शृंखला के चतुर्थ दिवस गुरुवार को सुश्री शताब्दि मल्लिक ने उज्जैन के तीन स्कूलों में अपनी प्रस्तुति दी। प्रथम प्रस्तुति प्रात: 8:15 बजे शासकीय उत्कृष्ठ उच्चतर माध्यमिक विद्यालय माधवनगर में हुई जहां कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक मंगलाचरण, दुर्गा स्तुति पर नृत्य कर की गई।
युवा विद्यार्थियों से मुखातिब होकर आपने बताया कि ओडिसी नृत्य की उत्पत्ति महारी एवं गोटीपुआ नृत्यों से मिलकर हुई है। देश की स्वतंत्रता के पश्चात देवदासी महारी पर प्रतिबंध लगा तो विद्वानों ने 6 से 14 वर्ष के बच्चों को लेकर लड़कियों के वेष में नृत्य कराना शुरू किए। देवदासी जो नृत्य करती थी वह भगवान जगन्नाथ के सामने करती थी। उसके बारे में ज्यादा लिखित कोई जानकारी नहीं मिलती है। इसके बाद विद्वानों ने महारी व गोटीपुआ से मिलकर इस नृत्य की उत्पत्ति की। यहां पर कलाकार का स्वागत शैफाली चतुर्वेदी ने किया। दूसरी प्रस्तुति प्रात: 9:30 बजे शासकीय नूतन कन्या माध्यमिक विद्यालय देसाई नगर में हुई जहां शताब्दि ने बच्चों को हस्त मुद्राएं एवं रामायण के कुछ प्रसंगों पर नृत्य कर नवरसों की जानकारी दी। यहां पर आभार प्रधान अध्यापिका श्रीमती सविता बत्रा ने माना। अंतिम प्रस्तुति प्रात: 11 बजे शासकीय माध्यमिक विद्यालय कोठी पर हुई। यहां पर सुश्री शताब्दि ने बच्चों की जिज्ञासाओं को अपने नृत्य की प्रस्तुति से शांत किया। ओडिसी नृत्य की दो मुख्य भंगिमाए होती है। पहली चौक व दूसरी त्रिभंगी। यहां आभार शिक्षिका मेघा व्यास ने माना।
आज अंतिम दिन 2 स्कूलों में होगी प्रस्तुति
शुक्रवार को अंतिम दिवस की प्रस्तुति प्रात: 8:15 बजे शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय हामूखेड़ी में होगी व दूसरी प्रस्तुति प्रात: 10 बजे शासकीय माध्यमिक विद्यालय दताना में होगी।